क़ुरबानी की वाजिबियत
इब्न रुश्द फरमाते हैं कि : क़ुर्बानी की पोज़ीशन के बारे मे पहले से ही उलेमा-ए-उम्मत का इख़्तिलाफ रहा है कि ये वाजिब है या सुन्नत? इमाम मालिक व शाफई तो फरमाते थे कि सुन्नत है मगर मोअक्किदा, लेकिन इसके बरअक्स इमाम अबू हनीफा का इरशाद है कि हर मुक़ीम (यानी जो मुसाफिर न हो) पर वाजिब है! जबकि इमाम अबू हनीफा के दो जलीलुल क़द्र शागिर्द इमाम मुहम्मद और इमाम अफू यूसुफ इसके वाजिब होने के क़ाईल नही थे! [بدایة المجتہد، طبع قاہرہ 1952، جلد 415/1] {قربانی کی شرعی حیثیت از رحمت اللہ طارق : ص 10}