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Showing posts from September, 2022

क़ुरबानी की वाजिबियत

  इब्न रुश्द फरमाते हैं कि : क़ुर्बानी की पोज़ीशन के बारे मे पहले से ही उलेमा-ए-उम्मत का इख़्तिलाफ रहा है कि ये वाजिब है या सुन्नत? इमाम मालिक व शाफई तो फरमाते थे कि सुन्नत है मगर मोअक्किदा, लेकिन इसके बरअक्स इमाम अबू हनीफा का इरशाद है कि हर मुक़ीम (यानी जो मुसाफिर न हो) पर वाजिब है! जबकि इमाम अबू हनीफा के दो जलीलुल क़द्र शागिर्द इमाम मुहम्मद और इमाम अफू यूसुफ इसके वाजिब होने के क़ाईल नही थे!  [بدایة المجتہد، طبع قاہرہ 1952، جلد 415/1]  {قربانی کی شرعی حیثیت از رحمت اللہ طارق : ص 10}

मुर्तद की सज़ा हनाफ में.

 गुस्ताख़ ए रसूल की एक ही सज़ा सर तन से जुदा.  ये नारा जो पाकिस्तान के शिद्दत पसन्द मौलवियों ने दिया है. भारत और पाकिस्तान में मुसलामानों की अकसरियत इमाम ए आज़म हज़रत अबू हनीफ़ा को मानने वाली है. इसलिए हमें ये देखना चाहिए कि इस मसले पर इमाम ए आज़म का क्या कहना है. शत्म ए रसूल यानी रसूल को बुरा भला कहने के मामले में इमाम  अबू सुलैमान ख़त्ताबी हज़रत अबू हनीफ़ा का कौल नकल करते हैं कि  وحكي عن أبي حنيفة أنه قال : لا يقتل الذمي بشتم النبي صلى الله عليه وسلم ما هم عليه من الشرك أعظم हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा से मरवी है कि उन्होंने फ़रमाया कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताख़ी की वजह से किसी ग़ैर मुस्लिम शहरी को क़त्ल नहीं किया जाएगा क्यूंकि जिस शिर्क पर वो पहले से है वो सब बड़ा जुर्म है (मआलिमुस सुनन शरह अबू दाऊद जिल्द 3 पेज 296)  इमाम आज़म अबू हनीफ़  और उनके तमाम शागिर्दों का यही मौक़िफ है कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी करने वाले को क़त्ल नहीं किया जाएगा कोई और सज़ा दी जाएगी. इमाम तहावी, इमाम हज़रत सुफ़ियान सौरी का भी यही ...